शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

विज्ञान और दर्शन में समानता



                                   
बहुत सी बातों में दर्शन और विज्ञान दोनों में बहुत  समानता है . सिर्फ तर्क रखने के ढंग अलग अलग हैं . इस लेख में मैं ऐसे ही कुछ विषयों पर प्रकाश डालना चाहता हूँ . वैदिक दर्शन के अनुसार संसार में हर वस्तु पञ्च महाभूत यानि कि पांच तत्वों से ही बनी है . और वो पांच तत्त्व हैं - अग्नि ,वायु , पृथ्वी ,आकाश और जल ! इसका अर्थ ये है की प्रत्येक वस्तु अपना रूप तो बदल सकती है लेकिन समाप्त नहीं हो सकती क्योंकि अंत में हर वस्तु का स्वरुप इन पांच तत्वों के रूप में विद्यमान रहने वाला है . उदहारण के लिए जब एक मृतक शरीर को जलाया जाता है तो हम देखतें हैं कि उसकी अस्थियाँ मिटटी बन कर पृथ्वी में समा जाती हैं ; शरीर में स्थित जल वाष्प के रूप में आकाश  में चला जाता है  ; और भिन्न भिन्न प्रकार के रसायन पैदा होतें हैं जो किसी न किसी रूप में इन्ही पांच तत्वों में विलीन हो जाते हैं . यही बात विश्व की हर वस्तु के साथ लागू होती है - पशु पक्षी ,जलचर नभचर , जड़ और चेतन - हर वस्तु का रूप बदलता रहता है लेकिन कुछ भी पूरी तरह मिटता नहीं . आइये इन पांच तत्वों की चर्चा जरा विस्तार से करें -

१. पृथ्वी - पृथ्वी शब्द का प्रयोजन इस परिभाषा में सिर्फ उस पृथ्वी का नहीं है, जिस पर हम निवास करतें हैं . पृथ्वी शब्द उन तमाम ग्रहों, उपग्रहों ,नक्षत्रों, उल्काओं और ठोस भूमि -पिंडों का नाम है जो पूरे ब्रह्माण्ड में हमारी पृथ्वी की तरह स्थित हैं. पृथ्वी का अर्थ वो सब कुछ है जिनसे पृथ्वी बनी है - मिटटी , पहाड़, खनिज , धातु , वनस्पति , हर वो वस्तु जो ठोस रूप में विद्यमान है .

२. जल - यहाँ जल उन सारे जल स्त्रोतों का नाम है जिनमे तरल रूप में जल अपने शुद्ध रूप या मिश्रित रूप में होता है . नदी, सागर, बावड़ी , हिम, वर्षा आदि अलग अलग स्त्रोत्र हैं जल के ; लेकिन फलों के रस में , मनुष्य और जानवरों के रक्त में , वनस्पति में , कीट पतंगों के शरीर में भी जल किसी न किसी रूप में विद्यमान है .

३. अग्नि - अग्नि शब्द भी बहुत व्यापक है . अग्नि का एक रूप है वो अग्नि जो हम यज्ञ के समय देखते हैं . वास्तव में हम अग्नि को महसूस करतें हैं - उष्मा के रूप में और प्रकाश के रूप में . सूर्य की किरणों में भी ये गुण है . ऊष्मा और प्रकाश - ये दोनों उदहारण है ऊर्जा यानि energy Energy के . ऊष्मा की उर्जा से बड़े बड़े थर्मल पावर प्लांट चलते हैं , जो हमें देते है - बिजली .बिजली के प्रभाव से चलती हैं मोटर और पम्प जो हमें शक्तिशाली यांत्रिक कार्य करने में मदद करते हैं . इस प्रकार हम देखतें हैं कि जितनी किस्म की ऊर्जाएं हैं वो सभी एक दूसरे  का बदला हुआ स्वरुप है . अग्नि का अर्थ इस परिभाषा में संपूर्ण ऊर्जा है . ऊर्जा जो किसी भी रूप में है जैसे - विद्युत , ध्वनि ,प्रकाश, चुम्बक , रसायन , यांत्रिकी , आणविक , ऊष्मा  या अन्य सभी जिनकी खोज विज्ञान ने की है या नहीं . 

४. वायु - सामान्य भाषा में हम वायु कहतें हैं जो हमारे भूमंडल को हर तरफ से घेरे हुए एक वातावरण है उसको ; जिसमे हम सब श्वास लेते हैं . शरीर से उत्पन्न होने वाली गैसों को भी अपान वायु कहतें हैं. विस्तृत रूप में वायु शब्द है उन सभी पदार्थों का जो गैस के रूप में विद्यमान है . जितनी किस्म की गैसें है - आक्सीजन , नायट्रोजन , कार्बन डाई आक्साइड , हिलिअम और हजारों प्रकार की जानी अनजानी गैसें - सभी का नाम है वायु .

५. आकाश - आकाश नाम है शून्य का. जिस जगह कुछ भी नहीं है, वहां है आकाश . शून्य जिसे वैज्ञानिक भाषा में स्पेस (Space) कहतें हैं , वो भी अपने अन्दर कुछ विशेषताएं रखता है . सबसे बड़ी विशेषता है की सारे गृह, उपग्रह, नक्षत्र , सूर्य , चन्द्रमा , पृथ्वी आदि इसमें स्थापित हैं .

अब अगर हम इन पाँचों तत्वों का जोड़ लगायें तो हम पायेंगे की हमने संपूर्ण ब्रह्माण्ड का जोड़ लगा दिया . सभी ठोस पदार्थ , सभी तरल पदार्थ , सभी गैसीय पदार्थ , सभी ऊर्जाएं और इन सब को धारण करने वाला संपूर्ण शून्य - यही तो है ईश्वर द्वारा रचित ब्रह्माण्ड . आइये दर्शन के इस महान सिद्धांत की तुलना करें कुछ विज्ञान की खोजों से !   

विज्ञान में दो सिद्धांत हैं जो इस प्रकार हैं -

1.    Law of conservation of Mass : In any closed system subjected to no external forces, the mass is constant irrespective of its changes in form; the principle that matter cannot be created or destroyed.

इस नियम के अनुसार विश्व में कोई भी पदार्थ न उत्पन्न  किया  जा  सकता  है  न  ही  नष्ट ; मात्र पदार्थ का स्वरुप ही बदल सकता है . इस बात को पूरी तरह दर्शन के चिंतन में लाने के लिए एक वाक्यांश  का प्रयोग हुआ है - In any closed system subjected to no external forces, इसका अर्थ है कि यह नियम लागू होता है एक ऐसे सीमाक्षेत्र में जिसमे बाहर कुछ भी जाने या बाहर से कुछ भी आने कि सम्भावना न हो . ऐसी सीमा संभव है जब हम पूरे ईश्वरकृत ब्रह्माण्ड को ही सीमा मान लें . अब अर्थ स्पष्ट है कि पूरे ब्रह्माण्ड में हर वस्तु का स्वरुप बदल सकता है लेकिन कोई भी वस्तु न तो नष्ट हो सकती है और न ही उत्पन्न . पूरे ब्रह्माण्ड का अर्थ ही है पाँचों तत्त्व .

2. The total amount of energy in any isolated system remains constant, and cannot be created or destroyed, although it may change forms.

विज्ञान के इस नियम के अनुसार एक बंद सीमाक्षेत्र में ऊर्जा की मात्रा अक्षुण (Constant) रहती है ; ऊर्जा को न तो उत्पन्न और न ही नष्ट किया जा सकता है . ऊर्जाका सिर्फ स्वरुप ही बदलता है . उदहारण के लिए एक बैटरी जिसमे कुछ मात्रा में रसायन भरा होता है , जब तारों से जोड़ कर उपयोग में ली जाती है तो रसायन ऊर्जा बदल जाती है विधुतीय ऊर्जा में . ये विधुतीय ऊर्जा काम आती है बड़े बड़े यंत्रों को चलाने के लिए जो  यांत्रिकी ऊर्जा से चलते हैं . उसी तरह जब हम एक माइक में कुछ बोलते हैं तो माइक से जुडी विधुतीय ऊर्जा हमारी आवाज को सैकड़ो गुना बढ़ा कर ध्वनि ऊर्जा में बदल देती है .

 विज्ञान के इन दोनों नियमों को अगर एक साथ जोड़ दिया जाए तो हमें प्राप्त होता है दर्शन का वही सूत्र - जिसके अनुसार विश्व के हर पदार्थ का आधार है - पञ्च तत्त्व जो किसी न किसी रूप में हमेशा विद्यमान रहतें हैं , क्योंकि उनकी उत्पति और विनाश नहीं होता; मात्र रूप परिवर्तन होता है .

जीवन के कुछ विषय ऐसे हैं जो आज भी विज्ञान की पहुँच के बाहर हैं - जैसे की जीवन मृत्यु का रहस्य . विज्ञान का क्षेत्र समाप्त हो जाता है व्यक्ति की मृत्यु  के साथ. मृतक शरीर के बारे में विज्ञान सारी जानकारी दे सकता है लेकिन उस जीव के बारे में नहीं जो की शरीर को त्याग कर कहीं विलीन हो जाता है . दर्शन का मानना है की जीव यानि आत्मा कभी नहीं मरता , वो एक शरीर से निकल कर दूसरे शरीर में प्रवेश करता है . दूसरे शरीर का स्वरुप किसी भी योनि  में हो सकता है- जैसे कुत्ता , बिल्ली, गाय , कीट , पतंग  आदि. अध्यात्म  का कहना है, उत्तम कर्म कर के आत्मा जीवन मरण के बंधन से छूट  जाता है और मोक्ष को प्राप्त होता है . मोक्ष की अवस्था में भी आत्मा समाप्त नहीं होता और आनंद की अवस्था में विद्यमान रहता है . दर्शन की इस परिकल्पना से एक और दृढ नियम प्रतिपादित होता है , जो इस प्रकार है

 Law Of Conservation Of Soul

संपूर्ण ब्रह्माण्ड में , जीवों या जीवात्माओं की संख्या स्थाई रूप से अक्षुण है, क्योंकि जीवात्मा न उत्पन्न होता है न ही नष्ट ; जो न घटती  है न बढती है. जीवात्मा मात्र अपना स्थान बदलता है , लेकिन उसका अस्तित्व लोक लोकान्तरों में, विभिन्न  योनिओं में और मोक्ष की स्थिति  में विद्यमान रहता है .
आज के समय में विज्ञान इस नियम पर कुछ कहने की स्थिति में नहीं है ; लेकिन कालांतर में शायद विज्ञान इस नियम की पुष्टि का भी कोई रास्ता निकालेगा .          

गुरुवार, 18 जुलाई 2013

विज्ञान की दृष्टि में जीवात्मा




अगर एक वैज्ञानिक से पूछा जाए की प्राण  क्या है , तो उसके पास कोई बहुत स्पष्ट उत्तर नहीं होगा . लम्बी चौड़ी व्याख्या तो वो करने लगेगा, लेकिन एक परिभाषा उसके पास नहीं मिलेगी .अगर ये पूछा जाए की जीवित होने के क्या लक्षण हैं ! इस प्रश्न के उत्तर में जैविक विज्ञान-विद ये लक्षण बताएँगे -

१.     जीवित प्राणी किसी न किसी रूप में ऊर्जा को अपने अन्दर लेता है .
२.     जीवित प्राणी अपने अन्दर से अपान वस्तुओं का त्याग करता है .
३.     जीवित प्राणी निरंतर परिवर्तनशील है.
४.     जीवित प्राणी वातावरण से प्रभावित होता है .
५.     जीवित प्राणी की संरचना में लम्बे अन्तराल में मौलिक परिवर्तन भी आते हैं .

एक विज्ञान विद से पूछा जाए की पृथ्वी पर जीवन का प्रारंभ कैसे हुआ ! इस प्रश्न का भी कोई स्पष्ट उत्तर मिलने की सम्भावना नहीं है . हाँ इस पर वो प्रचलित मान्यताओं में तीन का जिक्र करेगा -

 १. पृथ्वी पर विभिन्न धर्मावलम्बियों ने इस विषय पर अपनी अपनी अवधारणायें  बना रखी है ; सबकी सोच अलग अलग होते हुए भी एक बात सबकी मिलती है , वो यह की कोई बहुत बड़ी शक्ति है , जिसने पृथ्वी पर जीवन का प्रारंभ किया . ये अवधारणाएं पीढ़ी दर पीढ़ी पोषित हो रही हैं . हालाँकि इन धारणाओं को सही मानने के लिए कोई प्रमाण नहीं है , लेकिन इन्हें गलत सिद्ध करने के लिए भी कोई प्रमाण नहीं है . इसलिए विज्ञान की नजर में ये धारणायें विज्ञान की सीमा और सम्भावना के बाहर का विषय है . 
 २. दूसरी प्रचलित मान्यता के अनुसार जीवन ब्रह्माण्ड के किसी दूसरे भाग से संयोग मात्र से पृथ्वी पर आया है . कई वैज्ञानिकों का विश्वास है कि किसी पुच्छल  तारे या धूमकेतु या उल्का के पृथ्वी से टकरा जाने के कारण पृथ्वी पर जीव का प्रवेश हुआ है .उनके चिंतन के अनुसार जब ये खंड अपनी जगह से टूट कर सौर मंडल में प्रवेश कर रहे थे  तब सूर्य के मंडल में इनका कुछ भाग तो खो गया  और कुछ भाग अपने आप में जैविक परमाणुओं को लेकर  पृथ्वी पर आ मिला . अपनी बात के पक्ष में उनका कहना है कि प्रत्येक वर्ष पृथ्वी के किसी न किसी भाग में अंतरिक्ष से उल्का खण्डों की वर्षा होती है . ऐसे पुच्छल तारे दूसरे ग्रहों पर भी पहुंचतें हैं , ऐसे उदहारण है वैज्ञानिकों के पास.
 ३. तीसरी और सबसे प्रचलित मान्यता जो सबसे अधिक प्रचलित अवधारणा है विश्व के वैज्ञानिकों के बीच ; उसके अनुसार जीवन का प्रारंभ पृथ्वी पर करीब ३५० करोड़ वर्षों पहले हुआ था . पृथ्वी के मंडल में एक साथ बहुत मात्रा में रासायनिक प्रतिक्रियाएं हुई . १९५० में दो वैज्ञानिकों ने एक प्रयोग किया . उस प्रयोग में उन्होंने पृथ्वी के प्राचीन बाह्य मंडल को प्रयोगशाला के अन्दर निर्मित कर के , उस मंडल में कुछ रासायनिक प्रतिक्रियाओं का अध्ययन किया . उनका कहना था की उन प्रयोगों में जीवाणुओं के अंश ( अमीनो एसिड ) ऐसी अवस्था में पैदा होते हैं .उनका ये भी मानना है कि कालांतर में ये अंश एक दूसरे से जुड़  गए और जिससे हुआ- प्रारंभिक जीव का निर्माण . 
विज्ञान हो या दर्शन - जीवात्मा सबके लिए एक अनबूझ पहेली की तरह है .अंतर ये है की विज्ञान अपने प्रयत्नों से जीवात्मा के आने और जाने के कारण तथा जीवन की संरचना को ढूंढ रहा है और दर्शन ने इसे ईश्वरीय व्यवस्था मान कर जीवन को जीने के निर्देश तैयार कर लिए हैं . दोनों का साथ साथ चलना ही मानवता के लिए हितकारी है !

विज्ञान ने ये भी जानने  का प्रयास किया है की दूसरे  ग्रहों पर जीवन है या नहीं . आइये जानते हैं विज्ञान के इस अनुसन्धान से जुडी कुछ बातों को -
१. वृहस्पति (Jupiter): वृहस्पति ग्रह का बाह्य वातावरण बहुत ही शक्तिशाली गुरुत्व का है ; वहां काफी चाप के साथ तेज हवाएं २२५ मील से लेकर १००० मील प्रति घंटे की रफ़्तार से चलती हैं . तापमान बहुत ठंडा ( -२७० से ३२ डिग्री F के बीच ) रहता है .ये हवाएं और तापमान काफी हद तक जीवन की सम्भावना को नकारता है . सुनने में लगता है की ३२ डिग्री F तापमान तो जीवन के लिए अनुकूल है , लेकिन जहाँ तापमान ३२ डिग्री है वहां का दबाव उतना है जितना समुद्र के नीचे २ किलोमीटर उतरने के बाद होता है . संभवतः ये स्थान भी किसी तरल के अन्दर ही होगा ; वर्ना वायु हर जगह बर्फीली ही है .वायुमंडल में तीन प्रकार की गैसों के बादल पाए गए हैं - अमोनिया , अमोनिया मिश्रित सल्फर और जल ; जल संभवत बहुत ही मोटी मोटी बूंदों के रूप में वायुमंडल में स्थित है . वातावरण में ऊर्जा के भी स्त्रोत हैं , मुख्यतः बिजली (Lightening) , अल्ट्रा वायोलेट किरणे (U-V Rays ), और विद्युत से चार्ज कण . वृहस्पति गृह के अंतर तक जाने से तापमान १००००F डिग्री से ऊपर और दबाव पृथ्वी के समुद्र की सतह का ३० लाख गुना अधिक पाया जाएगा .इन सारे तःथ्यों के आधार पर अनुमान है कि कम से कम उस प्रकार का जीवन वहाँ संभव नहीं जैसा कि हम पृथ्वी पर पातें हैं .

२. मंगल (Mars) :
मंगल ग्रह का सतही दबाव करीब करीब उतना है जितना  दबाव पृथ्वी की सतह से ३५ किलोमीटर ऊपर जाकर होगा . पृथ्वी के ६ किलोमीटर के अर्धव्यास वाले वायुमंडल की तुलना में मंगल का वायुमंडल १०.८ किलोमीटर अर्धव्यास का है .मंगल के वायुमंडल में मुख्यतः ९५ % कार्बोन डाई   ओक्साइड , ३% नाइट्रोजन  और १.६ % आर्गन गैसें हैं . बचे हुए ०.६ % में ओक्सिजन और जल वाष्प के निशान हैं. वायुमंडल धूल से भरा है .    मंगल का तापमान -१२५ F  से २३ F  के बीच रहता है . मंगल की दूरी सूर्य से पृथ्वी की दूरी की डेढ़ गुना है , इसलिए उसे पृथ्वी की तुलना में मात्र ४३% प्रकाश ही सूर्य से मिल पाता है.  पूरे  सौर मंडल में मंगल ही एक ऐसा गृह है जहाँ पर सबसे शक्तिशाली धूल के बवंडर आते हैं . अपने सर्वाधिक रूप में ये बवंडर पूरे ग्रह को एक साथ लपेट लेते हैं . 
जुलाई १९९६ में अमरीका के जोहन्सन स्पेस सेंटर के डॉक्टर दविड़ मके और उनकी टीम ने एक सनसनीखेज घोषणा से विश्व को चौंका दिया . उनका दावा था कि उन्हें मंगल से टूट कर पृथ्वी पर गिरे एक खंड में जीवन संकेतक बैक्टीरिया होने के प्रमाण मिलें हैं . ये खंड अन्टार्क्टिका ध्रुव स्थित अल्लें हिल नामक जगह पर १९८४ में प्राप्त किये गए थे . अनुमान था कि ये खंड करीब १२००० वर्षों पूर्व वहाँ गिरा था . इस अनुसंधान ने पूरे विश्व में मंगल में जीवन होने के प्रति काफी आशाएं जगा दी . लेकिन धीरे वैज्ञानिकों में इस खोज के प्रति संदेह आते गए और यह निष्कर्ष नकार दिया गया . इसका आधार ये था कि बहुत सारे रसायन और आणविक संरचनाएं जो इस खंड पर पाई गयी , उसका होना, जीवन के होने न होने से सम्बंधित नहीं था .और जो बैक्टेरिया के नन्हे आकार थे, वो पृथ्वी पर पाए जीवन से १००० गुना सूक्ष्म थे, इसलिए उन्हें जीवन से मिलाना उचित नहीं था . कुछ कार्बन आधारित रसायन जो पाए गए थे , उनके बारे में ऐसा तर्क था कि वो उस खंड में पृथ्वी पर गिरने के बाद समा गए थे; क्योंकि उन १२००० वर्षों के दौरान ऐसे मौके आये थे जब वो खंड जल में भी डूब  गया था . वैज्ञानिकों का ये मानना है कि मंगल कि परिस्थितियां पहले से अब काफी बदली है ; इसलिए अगर उस आपतित खंड से जीवन के होने के प्रमाण नहीं मिलते तो जीवन के न होने के भी कोई बहुत बड़े कारण नहीं है !

 ३. शनि (Saturn) : वृहस्पति के समान शनि का वायुमंडल भी बहुत प्रतिकूल है ; शक्तिशाली गुरुत्व शक्ति , काफी अधिक  दबाव, २२५ से १००० मील प्रति घंटे के बीच चलने वाली तेज हवाएं और -२७० डिग्री से ८० डिग्री के बीच रहने वाला तापमान - ऐसे में जीवन की कल्पना बहुत मुश्किल है . ८० डिग्री तापमान वाले क्षेत्र में दबाव उतना ही है जितना समुद्र की सतह से २ मील नीचे जाने पर मिलेगा . शनि ग्रह का बाह्य वातावरण बना है  ९६.३ % मोलिकुलर ह्य्द्रोजन और ३.२५ हिलिअम गैसों से . इसके अलावा वायुमंडल में अमोनिया , एसितिलिन, इथेन , फोस्फाइन , और मीथेन गैसों की उपस्थिति है.  शनि के उपरी बादलों की तह में मुख्यतः अमोनिया के क्रिस्टल और निचली तह में अमोनियम सल्फाइड या जल कण पाए जाते हैं .
वृहस्पति के सामान वातावरण में ऊर्जा के भी स्त्रोत हैं , मुख्यतः बिजली, अल्ट्रा वायोलेट किरणे, और विद्युत से चार्ज कण . शनि  ग्रह के अंतर तक जाने से तापमान १०००० डिग्री से ऊपर और दबाव पृथ्वी के समुद्र की सतह का ३० लाख गुना अधिक पाया जाएगा .कुल मिला के निष्कर्ष भी वही की शनि ग्रह पर भी जीवन कम से कम उस रूप में पाए जाने की सम्भावना नहीं जो हम पृथ्वी पर देखते हैं .

 ४ टाईटन (Titan) :  टाईटन शनि ग्रह का एक उपग्रह है ;वैसे ही जैसे पृथ्वी के लिए चाँद .वैज्ञानिक मानते हैं की इस उपग्रह में पृथ्वी के वायुमंडल से बहुत समानताएं हैं ; लेकिन एक बड़ी विषमता है कि  टाईटन का तापमान बहुत ज्यादा ठंडा है ; करीब -३३० डिग्री से -२९० डिग्री के बीच . इतने ठन्डे वातावरण में जल का वाष्प रूप में वायुमंडल  में पाया जाना असंभव है . टाइटन के वायुमंडल में एक प्रकार का धुआं सा है जो सूर्य की किरणों का वापस शुन्य में परावर्तित कर देता है ; परिणाम स्वरुप यहाँ सूर्य की किरणों का पृथ्वी  की बनिस्पत सिर्फ १% अंश ही पहुँचता है ; यही कारण है यहाँ की भीषण ठंडक का . 
पृथ्वी की तरह वहां के वायुमंडल में प्रचुर मात्र में नाइट्रोजन गैस है ; इसके अलावा कई किस्म के जटिल अणु भी हैं. मीथेन गैस का तो एक महासागर होने की सम्भावना है; जो हो सकता है किसी न किसी तरल का भण्डार हो . ठन्डे तापमान के अलावा बाकी सारी बातें जीवन के होने के लिए अनुकूल हैं . वैज्ञानिकों का मानना है की पृथ्वी पर भी ऐसे प्राणी पाए जाते हैं जो अति शीत में भी जीवित रहतें हैं , तो संभव है कि वहां के तापमान में भी जीवित रह सकने वाले प्राणी होंगे .  वहां के वातावरण में मीथेन और ईथेन गैसों के बदल हैं . पृथ्वी के सामान हवा और वर्षा होने के प्रमाण हैं . और पृथ्वी की सतह की तरह रेतीले पहाड़ , नदियाँ , झीलें और समुद्र (संभवतः मीथेन और ईथेन तरल अवस्था में ) आदि का होना भी संभावित है . मौसम बदलने के भी संकेत हैं . वैज्ञानिक टाईटन को पृथ्वी का प्रारम्भिक रूप मानते हैं . इस उपग्रह को ब्रह्माण्ड में जीवन के कण देने का  उदगम   भी मानते हैं .कुल मिला कर टाईटन उपग्रह पर जीवन होने की बहुत अधिक सम्भावना है ; जीवन जो जल की जगह मीथेन के समुद्र में सुरक्षित  हो !
जीवन की ये गुत्थियाँ कभी सुलझ पाएंगी या नहीं ? वैज्ञानिक अपने प्रयोगों में लगे रहेंगे . क्या जीव का निर्माण प्रयोगशाला में हो पायेगा ? क्या ऐसी कोई सफलता मानव के कल्याण के लिए उचित होंगी ? बहरहाल जीवन और श्रृष्टि यूँ ही चलती रहेगी . विश्व को सुचारू रूप से चलाने के लिए वैदिक कर्म फल सिद्धांत , जीवाणु की अक्षुणता , पुनर्जन्म का सिद्धांत और मोक्ष की प्राप्ति का लक्ष्य  - ये विश्वास ही मान्य हैं . मानव समाज की निर्धारित मर्यादाओं का पालन इन्ही विश्वासों के सहारे संभव है .

बुधवार, 17 जुलाई 2013

दर्शन बनाम विज्ञान




दर्शन और विज्ञान के बीच हमेशा एक तर्क वितर्क की स्थिति रही है . ये स्थिति भारत में उतनी गंभीर नहीं जितनी पाश्चात्य देशों में है ; इसका कारण है कि भारतीय आम तौर पर जन्म से ही धार्मिक होतें हैं , विज्ञान उन्हें शिक्षा के रूप में प्राप्त होता है , इसलिए विज्ञान उनके विश्वासों को चुनौती नहीं देता .

विश्व में दर्शन और विज्ञान दो परस्पर विरोधी धाराएँ  मानी जाती रही है .विज्ञान-विदों का ये आरोप होता है कि दार्शनिक सच्चाई से दूर अपने काल्पनिक जगत में विचरण करतें हैं . अपनी आराम कुर्सी पर बैठ कर वो लोग कुछ मनगढ़ंत परिकल्पना कर लेतें हैं और फिर उसी कल्पना की गिरफ्त में वो अपने विचार बनाते रहतें हैं . उदहारण देते हैं गैलिलेओ जैसे वैज्ञानिकों का, जिनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण को तत्कालीन दार्शनिकों ने धोखा बताया और उन्हें अपनी बात को त्यागने पर मजबूर किया . विज्ञान का एक और गंभीर आरोप रहा है दर्शन पर - दर्शन अपने विश्वास पर इतना अडिग रहता है कि सत्य को कभी स्वीकार नहीं करता और इस तरह विश्वास को सत्य का शत्रु बना लेता है .

अगर हम भारतीय दृष्टिकोण से देखें तो हम पायेंगे की दर्शन और विज्ञान एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. दोनों का आधार एक है - जिज्ञासा ! मनुष्य के अन्दर एक नैसर्गिक गुण है - जिज्ञासा . वह हर चीज का कारण ढूंढता रहता है. इस ढूँढने की प्रक्रिया दो है - दर्शन और विज्ञान . विज्ञान का जन्म दर्शन की कोख से हुआ है . दर्शन एक दृष्टिकोण देता है - विज्ञान उस दृष्टिकोण  के पुष्टिकरण के लिए कार्यरत होता है . जब विज्ञान की खोज दर्शन के विश्वास की पुष्टि कर देती है तो दोनों में कोई विरोध नहीं होता ; बल्कि दोनों अपनी अपनी अपनी  जगह मजबूत हो जाते हैं . इसके विरुद्ध जब विज्ञान अपने प्रयोगों और पूर्व स्थापित नियमों के आधार पर दर्शन को गलत ठहराता है तो स्थिति टकराव की बनती है . सवाल खड़ा हो जाता है श्रेष्ठता  का . और ऐसी स्थिति ही विषय होना चाहिए दर्शन शास्त्रियों का , जहाँ हठ त्याग कर उन्हें वास्तविकता तक पहुंचना चाहिए .

सत्य और विश्वास में वही  अंतर है जो मनुष्य और परमात्मा में है . जहाँ तक मनुष्य की बुद्धि सक्षम है वहां तक मनुष्य विज्ञान की सहायता से हर सत्य तक पहुँचता है . इस सत्य को सही मानना उसका अधिकार भी है और उचित भी . जो धारणाएं प्रयोगों और उनसे निकलने वाले निर्णयों पर आधारित है वो मान्य होती हैं . उदहारण के लिए चन्द्रमा के धरातल और उसके मंडल पर मनुष्य की प्राप्त की गयी जानकारी . अगर दुनिया का कोई दार्शनिक चन्द्रमा को लेकर अभी भी गपोड़ों में विश्वास करेगा तो वो परिहास का ही कारण होगा .क्योंकि मनुष्य अपने प्रयासों से चन्द्रमा तक पहुँच गया और जो उसने वहां जाकर अनुभव किया वो ही सत्य है , ना कि  हजारों वर्षों से चला आ रहा कोई विश्वास .

लेकिन जहाँ विज्ञान की सीमा समाप्त होती है वहां शुरू होती है दर्शन की सीमा . जिन प्रश्नों के उत्तर विज्ञान चाह कर भी नहीं निकाल पाता वहां मनुष्य की जिज्ञासु प्रवृति कुछ परिकल्पनाएं करती है . उन परिकल्पनाओं से पैदा होने वाले प्रश्नों का समुचित उत्तर खोजती है. जब वो उत्तर उन परिकल्पनाओं को और पुष्ट करतें हैं तब वो जिज्ञासा अगले प्रश्नों तक पहुँच जाती है . उदहारण के लिए - विज्ञान ने पृथ्वी, चन्द्रमा, सूरज, नक्षत्रों के विषय में बहुत सी जानकारी तो हासिल कर ली - लेकिन अगर पूछें कि  इस विशाल ब्रह्माण्ड की गति को नियमबद्ध कौन करता है - तो उसके पास इस प्रश्न का उत्तर नहीं है . यहाँ आकर दर्शन की परिकल्पना एक विश्वास को जन्म देती है - एक वृहद् शक्ति है जिसके अन्दर सभी लोक लोकान्तरों को नियमबद्ध तरीके से चलाने की क्षमता है - जिसे हम  ईश्वर कहतें हैं . विज्ञान के पास इस बात को न मानने के कोई कारण नहीं है , लेकिन अगर वैज्ञानिक हठधर्मिता से इसे मानने से इनकार करे तो उसका कोई अर्थ नहीं . इसे न मानने की स्थिति में उसे इस मौलिक प्रश्न का उत्तर देना पड़ेगा कि ब्रह्माण्ड की रचना और फिर इसका सञ्चालन कौन करता है ?

उसी प्रकार एक उदहारण और लेते हैं - मानव शरीर का . आज का चिकित्सा विज्ञान बहुत विकसित हो चुका है. मुश्किल से मुश्किल बिमारियों का इलाज निकल चुका है . शरीर की धड़कन, रक्त चाप , शरीर के निर्माण के अवयव आदि का पता लगा लेता है . इन सब बातों में दर्शन को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए . इलाज के परिणाम सामने आते रहते हैं . लेकिन फिर इस चिकत्सा विज्ञान की भी अपनी सीमायें हैं . विज्ञान मनुष्य के रक्त की सफाई कर सकता है , उसे एक मनुष्य से निकाल कर दूसरे मनुष्य को दे सकता है - लेकिन क्या वो इस रक्त की रचना कर सकता है . मनुष्य की मृत्यु से लड़ सकता है लेकिन क्या वो उसे रोक सकता है ? और इस से भी अधिक गहन प्रश्न - वो क्या था जो मनुष्य के शरीर से निकलने के बाद मनुष्य एक शव बन जाता है ? और वो जो निकलता है वो कहाँ जाता है ? बस यही समाप्त होती है विज्ञान की सीमा और शुरू होती दर्शन की सीमा . दर्शन अपने परिकल्पित ईश्वर को कारण मानता है- इन सब अनुतरित घटनाओं का . जब मनुष्य और सोचता है की क्यों कोई व्यक्ति जल्दी मर जाता है , या बहुत कष्ट पाकर मरता है ; इतना ही नहीं वो सोचता है कि क्यों कोई प्राणी जन्म लेता है , और क्यों कभी मनुष्य और कभी और जीव जंतु का जन्म होता है तो दर्शन की सोच पहुँचती है - पुनर्जन्म , कर्मफल सिद्धांत , अलग अलग योनियों का कारण आदि तक . इन सब अवधारणाओं के पीछे एक और बात छुपी होती है - इन सब मान्यताओं का समाज पर क्या असर पड़ेगा . उदाहरण के तौर पर कर्मफल का सिद्धांत मनुष्य को अच्छे कर्म करने के लिए प्रोत्साहित ही करेगा , बुरे कर्म करने से भयभीत करेगा .

इस प्रकार हम देखतें हैं कि विज्ञान और दर्शन दोनों ही मनुष्य के मित्र हैं . विज्ञान की खोज मनुष्य के भौतिक जीवन में खुशियाँ लाती हैं तो दर्शन मनुष्य के गुण कर्म और स्वाभाव में सुधार लाता है . दुर्भाग्य से दोनों का दुरुपयोग शुरू हो गया . विज्ञान का उपयोग जहाँ मनुष्य के विनाश की सामग्री में शुरू हो गया , वहीँ दर्शन में गलत मिलावट के कारण अन्धविश्वास का प्रवेश हो गया . दर्शन के कर्मफल से पैदा होने वाले भय का दुरुपयोग कर के लोगों ने मनुष्य को सच्चाई से दूर कर के ढकोसलों में फंसा दिया . विज्ञान के दुरुपयोग ने परमाणु बम और अन्य हथियारों को जन्म दिया . गलत विश्वासों ने आतंकवाद जैसे राक्षस को जन्म दिया .बुराई विज्ञान या दर्शन में नहीं है , बुराई है इनके दुरुपयोग में . आवश्यकता है विज्ञान और दर्शन को एक साथ बैठ कर एक स्वस्थ और भय रहित विश्व का निर्माण करने की .