गुरुवार, 29 अगस्त 2013

गोड पार्टिकल और त्रैतवाद





जुलाई २०१२  की शाम को देश के सारे टेलीविजन बहुत अजीबोगरीब समाचार सुना रहे थे , जिनकी हेडलाइन थी - ' ईश्वर' की खोज ; ईश्वर का रहस्य खुला ; भगवान् का पता चला आदि . लोग विस्मय से टेलीविजन के सामने बैठ गए . लेकिन इन सभी चैनलों ने जो बताया और दिखाया उसका सार शायद खुद समाचार वाचक नहीं समझ पा रहे थे . चित्र के नाम पर एक बड़ी सी पाइपनुमा मशीन दिखा रहे थे  और बहुत ही उलझी हुई भाषा में किसी हिग्ग्स बोसोन पार्टकिल की चर्चा कर रहे थेमैं नहीं समझता की किसी भी आम आदमी को इस चर्चा में कुछ भी समझ में आया . ये सारी चर्चा विज्ञान के एक नए अविष्कार पर ही थीजिसमें ईश्वर का नाम जुड़ा  होने के कारण हर भारतीय इसे समझने की कोशिश में था . 

इस लेख में मैं इस विषय को एक आम आदमी की समझ के अनुसार लिखने का प्रयास कर रहा हूँ . स्कूल और कोलेज में विज्ञान का विद्यार्थी  थाइसलिए  उन दिनों का पढ़ा हुआ भौतिक विज्ञान याद करता हूँविज्ञान में पढाया गया था कि परमाणु पदार्थ का सूक्ष्मतम  कण है , जिसे सामान्य रूप से देख पाना संभव नहीं है . विज्ञान ने इसके आगे बताया कि  एक परमाणु भी बहुत सारे कणों से बनता है , जिन्हें आणविक कण ( Atomic Particles) कहते हैं . इन कणों में जो ज्ञात मुख्य कण थे उनके नाम हैं - प्रोटोनइलेक्ट्रोन और न्यूट्रोन   . इन कणों को नापना भी बहुत मुश्किल है क्योंकि साधारण  नाप तौल के यंत्रों की सीमा में ये नहीं आते .तुलनात्मक रूप में प्रोटोन सबसे भारी और धनात्मक विद्युत् युक्त , इलेक्ट्रोन अपेक्षाकृत कम भारी और ऋण-आत्मक विद्युत युक्त एवं न्यूट्रोन एक प्रोटोन और इलेक्ट्रोन के योग के बराबर वजन और बिना किसी विद्युत का कण हैं .प्रोटोन और न्यूट्रोन परमाणु के केंद्र में स्थापित है और इलेक्ट्रोन इस केंद्र के चारों तरफ चक्कर काटता है .  इस पूरे निर्माण को स्थाइत्व देने के लिए कुछ अस्थायी और अत्यधिक उर्जा से पूर्ण कण हैं जिन्हें कहते हैं - क्वार्क्स . ये क्वार्क किसी भी प्रकार देखे नहीं जा सकते , क्योंकि वो बहुत सूक्ष्म होते हैं और बहुत अधिक गति से दुसरे कणों से जुड़ते रहते हैं .क्वार्क्स के अन्दर क्या आते हैं , यही बहुत लम्बे काल से वैज्ञानिकों का शोध का विषय रहा है .

१९२०-३० के शतक में भारत के एक वैज्ञानिक श्री सत्येन्द्र बोस ने  परमाणु की रचना पर एक परिकल्पना की - वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर . अपनी अवधारणा  पर टिपण्णी के लिए उन्होंने अपने लेख को भेज दिया , विश्व के महानतम वैज्ञानिक श्री अलबर्ट आइन्स्टीन के पास जर्मनी . आइन्स्टीन उनके विचारों से बहुत प्रभावित हुए ; उन्होंने बोस के लेख को जर्मन भाषा में अनुवादित कर के विश्व की अत्यधिक प्रमाणिक एक जर्मन वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित किया .   यह घटना है १९२४ की . उनकी अवधारणा से जुड़ते हुए आइन्स्टीन ने उनके साथ मिल कर एक नयी अवधारणा प्रतिपादित की , जिसे वैज्ञानिक जगत में ' बोस आइन्स्टीन कंडेनसेट अवधारणा ' के नाम से जाना जाता है . अपनी अवधारणा में बोस ने जिस कण के होने की चर्चा की उस कण को नाम दिया गया 'बोसोन' .  

जुलाई२०१२ के पहले सप्ताह में स्विट्जरलैंड के जिनेवा शहर में वैज्ञानिकों ने एक सफल प्रयोग की घोषणा की . उनका प्रयोग था एक बहुत बड़ी मशीन में परमाणु का विघटन कर के उसकी रचना पर शोध करना . उन्होनों दावा किया की उनके प्रयोग में सत्येन्द्र बोस की परिकल्पना के आधार पर माना गया परमाणु-अंश बोसोन , जो की समय के साथ साथ जुड़ गया एक और अंग्रेज वैज्ञानिक पीटर हिग्ग्स के नाम के साथ और बन गया - 'हिग्ग्स बोसोन' , प्राप्त कर लिया गया है . अपनी बात को सत्यापित करने के लिए CERN , जिनेवा की प्रयोगशाला में बनाया गया - एक विशाल हड्रों-कोलाईडर जिस पर कुल खर्च आया १००० करोड़ डॉलर .

आखिर इसमें ईश्वर का नाम कैसे गया ? इस बात का कारण मिलता है हमें उस प्रश्न से जिसमे वैज्ञानिक अपने आप से पूछ रहे थे कि इतने सूक्ष्म कणों के सम्मिलन से इतने विशाल ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति कैसे संभव हुई .बिना प्रचुर मात्रा में पदार्थ हुए इस तरह की  रचनाएँ कहाँ से आई ? पीटर हिग्ग्स की  परिकल्पना के अनुसार बोसोन जैसे कण ब्रह्माण्ड में हैं और उनके अन्दर एक चिपकने वाला वातावरण बनाने की  क्षमता है जिससे वो अन्य कणों से जुड़ते चले जाते हैं , और शून्य से निर्माण हो जाता है बड़ी बड़ी रचनाओं का .जिनेवा के प्रयोग में ये तथ्य सिद्ध हुआ है .विज्ञान की दृष्टि में ये प्रयोग बहुत महत्वपूर्ण है , क्योंकि इसकी सत्यता से उनकी ब्रह्माण्ड की रचना से सम्बंधित सारी परिकल्पनाएं सत्य हो जाती है .

ये तो था वैज्ञानिक तथ्य इस ईश्वरीय कण (God Particle) नामक काल्पनिक कण की खोज का . आइये अब इस बात के आध्यात्मिक और दार्शनिक पक्ष  की भी चर्चा करें . सबसे पहली बात की हिग्ग्स बोसोन कण का नाम गोड-पार्टिकल क्यों पड़ा ! लियोन लीडरमैन नामक एक लेखक ने एक पुस्तक लिखी, जिसका विषय विज्ञान के दृष्टिकोण से ब्रह्माण्ड की रचना पर खोज थाउन्होंने सोचा की इस परिकल्पित कण को यदि गोड पार्टिकल नाम दे दिया जाए तो बहुत बड़ी सनसनी फैलेगी ; इसलिए उन्होंने अपनी पुस्तक का नाम रख दिया 'गोड पार्टिकल' .

अब अगर सारी वैज्ञानिक अवधारणयें  सच मान ली  जाए तो सिद्ध क्या हुआ ? ये कहना तो मूर्खतापूर्ण बात है कि इस तरह का कण ही ईश्वर है .ये बात सिर्फ वही कह सकते हैं जिन्हें ईश्वर  की सत्ता का सतही ज्ञान भी नहीं हैसिद्ध यही होता है की  सारा ब्रह्माण्ड जिसमे आते हैं बड़े बड़े ग्रह , उपग्रह , पृथ्वी , चंद्रमा , नक्षत्र और उनपर बने हुए भूखंड , पर्वत , समुद्र , नदियाँ और समस्त पृकृति,  उसके  निर्माण का मूल कारण हिग्ग्स बोसोन कण हो सकता है . और इसे मानने में कोई हर्ज भी नहीं हैत्रैतवाद के सिद्धांत के अनुसार ईश्वर , जीव और प्रकृति तीन अलग अलग सत्ता है . तीनों अपने आप में सम्पूर्ण हैं . जैसे जीव कभी समाप्त नहीं होता सिर्फ अपना रूप बदलता रहता हैउसी  तरह प्रकृति भी कभी समाप्त नहीं होती , उसका भी रूपांतरण होता रहता है . जैसे सागर के जल से वाष्प , वाष्प से बादल और बादल से फिर जल की रचना होती है , उसी तरह संभवतः अति सूक्ष्म कणों के संयोजन से विशाल ग्रहों का निर्माण संभव है . विज्ञान के Law Of Conservation Of Matter (पदार्थ के कभी समाप्त होने का नियम ) के अनुसार भी ये बात सही बैठती है . प्रलय के समय संभवतः ये ग्रह उपग्रह आदि पुनः उसी तरह के सूक्ष्म कणों में बँट कर विलीन हो जाते होंगे ; जो वास्तव में विलीन होकर सूक्ष्मतम कण के रूप में विद्यमान रहते हैं ; जैसा की जिनेवा के प्रयोग में वैज्ञानिकों ने परमाणु को ऐसे कणों में विभक्त कर के बताया .

 जैसे जीव का आवागमन उसके कर्मों के आधार पर चलता रहता है ; वैसे ही प्रकृति का परिवर्तन भी उसके अन्दर होने वाली  निरंतर क्रियाओं से चलता रहता है . बड़े बड़े पर्वतों के खंड जल के बहाव में छोटी छोटी रेत के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं . बर्फीले पहाड़ पिघल कर सागर बन जाते हैं . पृथ्वी के अन्दर की अग्नि कभी लावा बन कर ज्वालामुखी के रूप में फूट पड़ती है ; उसी तरह हिग्ग्स बोसोन कणों का भूखंड बनना भी संभव है .मेरे विचार में हिग्ग्स बोसोन त्रैतवाद के सिद्धांत को ही मजबूत बनाता है .

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